कचरे से बदलाव तक: भारतीय शहरों में प्लास्टिक प्रबंधन की नई तस्वीर
प्लास्टिक कचरे की समस्या से निपटने के लिए देश के कई शहरों में अब सिर्फ प्रतिबंध और जुर्माने पर निर्भरता नहीं है। बाजारों में कपड़े के थैले को बढ़ावा देने से लेकर पुराने प्लास्टिक की वापसी, कचरे की छंटाई और उसे नए उत्पादों में बदलने तक कई स्थानीय पहलें सामने आई हैं। कम इस्तेमाल, पुन: उपयोग, वापसी, पुनर्प्राप्ति और पुनर्निर्माण के जरिए प्लास्टिक को कचरे से संसाधन में बदलने की कोशिश हो रही है।
प्रमुख बिंदु
- स्वच्छ भारत मिशन ने बदली व्यवस्था: 2 अक्टूबर 2014 को शुरू हुए स्वच्छ भारत मिशन के तहत कचरा संग्रह, स्रोत पर पृथक्करण और सामग्री पुनर्प्राप्ति की व्यवस्थाओं को मजबूत किया गया।
- सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक: 1 जुलाई 2022 से चिन्हित एकल-उपयोग वाली प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लागू है।
- त्रिची में कपड़े के थैलों को बढ़ावा: तेन्नूर, केके नगर और वरैयूर के तीन किसान बाजारों में 220 विक्रेताओं को अभियान से जोड़ा गया।
- हजारों किलो प्लास्टिक की बचत: तेन्नूर बाजार में एक साल में 2,200 किलो, केके नगर में चार महीने में 620 किलो और वरैयूर में छह महीने में 300 किलो सिंगल यूज प्लास्टिक की बचत दर्ज की गई।
- महाराष्ट्र में ‘थैला एटीएम’: वीटा शहर में पांच मशीनों के जरिए लोगों को आसानी से पुन: उपयोग योग्य कपड़े के थैले उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
- स्थानीय महिलाओं को रोजगार: स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं इन मशीनों के लिए कपड़े के थैले तैयार कर रही हैं। अब तक करीब 6,000 बैग बेचे जा चुके हैं।
- प्लास्टिक लौटाने पर इनाम: अंडमान और निकोबार में इस्तेमाल किए गए दूध के पाउच वापस करने पर दूध और छूट जैसे प्रोत्साहन दिए गए। नवंबर 2024 तक 17,600 पाउच एकत्र किए गए।
- बेंगलुरु में प्लास्टिक की रिकवरी: स्वच्छता केंद्र में प्लास्टिक कचरे को छांटकर श्रेडिंग और बेलिंग के जरिए पुनर्चक्रण योग्य सामग्री में बदला जा रहा है।
- कचरे से रोजगार: बेंगलुरु की इस पहल ने कोविड-19 के दौरान 76 सफाई साथियों को रोजगार भी उपलब्ध कराया।
- पटियाला में MLP का नया इस्तेमाल: चॉकलेट रैपर, चिप्स पैकेट और शैंपू पाउच जैसे मुश्किल से रिसाइकिल होने वाले मल्टीलेयर्ड प्लास्टिक को चिपबोर्ड में बदला जा रहा है।
- लैंडफिल पर दबाव कम करने की कोशिश: पटियाला की सुविधा प्रतिदिन करीब 10 टन कचरे को संसाधित करने की क्षमता रखती है और 75 से 100 चिपबोर्ड तैयार करती है।
बाजार से शुरू हो रहा बदलाव
प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने की कोशिशों में बाजार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। त्रिची में ‘थुनिप्पई थिरुविझाई’ यानी क्लॉथ-बैग फेस्टिवल के जरिए दुकानदारों और ग्राहकों को कपड़े के थैलों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया गया। इससे यह संदेश गया कि प्लास्टिक का विकल्प तभी प्रभावी होगा, जब वह लोगों को आसानी से उपलब्ध हो।
‘थैला एटीएम’ से आसान हुआ विकल्प
महाराष्ट्र के वीटा में लगाए गए पांच ‘थैला एटीएम’ लोगों को जरूरत पड़ने पर कपड़े का थैला उपलब्ध कराते हैं। मशीनों में बैग की उपलब्धता की निगरानी तकनीक के जरिए की जाती है। इस पहल ने प्लास्टिक का विकल्प उपलब्ध कराने के साथ स्थानीय स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के लिए आय का अवसर भी तैयार किया है।
प्लास्टिक लौटाइए, प्रोत्साहन पाइए
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की बाय-बैक पहल प्लास्टिक कचरे को मूल्य देने का प्रयास है। दूध के खाली पाउच वापस करने पर लोगों को दूध और अन्य प्रोत्साहन दिए गए। नवंबर 2024 तक 17,600 पाउच के बदले 352 लीटर दूध का प्रतिफल दिया गया।
कचरे से सड़क और फर्नीचर तक
बेंगलुरु में प्लास्टिक कचरे को सामग्री रिकवरी सुविधा में छांटकर संसाधित किया जाता है। इसके बाद तैयार सामग्री का इस्तेमाल सड़कों, कृषि जल पाइप और फर्नीचर जैसे उत्पादों में किया जा रहा है। इससे कचरे के निपटान के साथ आजीविका को भी जोड़ा गया है।
मुश्किल प्लास्टिक का भी समाधान
मल्टीलेयर्ड प्लास्टिक को रिसाइकिल करना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। पटियाला में इसे साफ कर छोटे टुकड़ों में बदलने के बाद दबाव आधारित प्रक्रिया से चिपबोर्ड तैयार किया जा रहा है। इस सामग्री का इस्तेमाल फर्नीचर, छत और अस्थायी आश्रयों में किया जा सकता है।
आगे की राह
इन पहलों से यह स्पष्ट होता है कि प्लास्टिक कचरे से निपटने का रास्ता केवल प्रतिबंध तक सीमित नहीं है। स्रोत पर कचरा अलग करना, घर-घर संग्रह, पुन: उपयोग, वापसी, पुनर्चक्रण और नए उत्पाद तैयार करना—ये सभी कदम मिलकर प्लास्टिक प्रबंधन को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। स्थानीय स्तर पर शुरू हुई ये पहलें रोजमर्रा की आदतों को बदलने और कचरे को संसाधन में बदलने की दिशा दिखाती हैं।
स्रोत्र – पीआईबी