Shikhar Samvad

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एमएमडीआर संशोधन पर झारखंड में सियासी घमासान बाबूलाल मरांडी का झामुमो कांग्रेस पर बड़ा हमला

रांची: MMDR संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर झारखंड की सियासत गरमा गई है। संसद से विधेयक पारित होने के बाद बीजेपी के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने JMM, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन पर तीखा हमला बोला है। बीजेपी प्रदेश कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मरांडी ने कहा कि विपक्ष को कानून की सही जानकारी लेकर संसद में बहस करनी चाहिए थी, लेकिन वहां हंगामा किया गया।

क्या है MMDR संशोधन विधेयक?

Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 देश में खनन और खनिज विकास को नियंत्रित करने वाला प्रमुख केंद्रीय कानून है। 2026 के संशोधन विधेयक का सबसे बड़ा फोकस खनिज अधिकार और खनिज-bearing जमीन पर लगने वाले टैक्स, सेस और दूसरी लेवी को लेकर है। विधेयक में नई धारा 9D जोड़ने का प्रावधान है। इसके तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकार या खनिज-bearing जमीन पर अपनी ओर से टैक्स/सेस/लेवी तभी लगा सकेंगी, जब वह केंद्र सरकार द्वारा तय शर्तों या प्रतिबंधों के अनुरूप हो।

केंद्र सरकार का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में खनिजों पर अलग-अलग और कई बार अतिरिक्त लेवी लगने से खनन उद्योग पर लागत बढ़ती है। सरकार के मुताबिक इससे निवेश प्रभावित होता है, खनिज उत्पादन महंगा होता है और छोटे एवं मध्यम स्तर के खनन कारोबार पर भी दबाव पड़ सकता है। विधेयक का उद्देश्य खनिज क्षेत्र में टैक्स व्यवस्था को ज्यादा एकरूप, स्थिर और अनुमानित बनाना बताया गया है।

बाबूलाल ने JMM-कांग्रेस पर साधा निशाना

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि 13 अगस्त को जब MMDR संशोधन विधेयक राज्यसभा से पारित हो रहा था, तब विपक्ष को सदन में अपनी बात और आपत्ति मजबूती से रखनी चाहिए थी। उनका आरोप है कि JMM, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के नेता अब संसद में बहस करने के बजाय केंद्र सरकार को धमकी देने का काम कर रहे हैं।

मरांडी ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य सिर्फ झारखंड के लिए नहीं है, बल्कि देशभर के खनिज क्षेत्रों के लिए एक समान व्यवस्था बनाना है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह व्यवस्था पूरे देश के लिए है, तो सिर्फ झारखंड में इसे लेकर इतना विरोध क्यों किया जा रहा है।

‘छोटे उद्योगों पर भी पड़ता है असर’

बीजेपी नेता ने कहा कि खनिज पर अलग-अलग तरह की अतिरिक्त लेवी का असर केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर छोटे उद्योगों, खनिज आधारित कारोबार और उन राज्यों पर भी पड़ सकता है जहां झारखंड से खनिज भेजे जाते हैं।

उन्होंने दावा किया कि राज्य सरकार की ओर से लगाया गया अतिरिक्त बोझ झारखंड के औद्योगिक माहौल को प्रभावित करता है। हालांकि, इस मुद्दे पर राज्य सरकार और विपक्ष की आपत्तियां केंद्र के दावे से अलग हैं। विपक्ष इसे राज्यों के कर लगाने के संवैधानिक अधिकार और वित्तीय स्वायत्तता से जोड़कर देख रहा है। PRS के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले में राज्यों की mineral rights पर टैक्स लगाने की शक्ति को मान्यता दी गई थी, जबकि 2026 का विधेयक इस शक्ति पर नई सीमाएं लगाने का प्रयास करता है।

DFMT और छात्र आंदोलन का भी जिक्र

बाबूलाल मरांडी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान DFMT फंड का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि JPSC-JSSC को लेकर छात्र-युवाओं का आंदोलन लगातार चल रहा है और सरकार इस मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए MMDR संशोधन को लेकर राजनीतिक माहौल बना रही है।

केंद्र बनाम राज्य, अब बढ़ेगी सियासी लड़ाई

MMDR संशोधन विधेयक को लेकर असली विवाद अब खनिज राजस्व, राज्य की वित्तीय स्वायत्तता और केंद्र के अधिकार के बीच दिखाई दे रहा है। केंद्र सरकार इसे खनन क्षेत्र में स्थिरता और समान व्यवस्था की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, जबकि आलोचक इसे राज्यों के अधिकारों को सीमित करने वाला कदम मान रहे हैं।

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