पटना: पटना रंगमंच की दुनिया में दशकों तक अपनी अलग पहचान बनाने वाले वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश आनंद के आकस्मिक निधन से कला और रंगमंच जगत में गहरा शोक है। उन्हें प्यार और सम्मान से पटना रंगमंच का ‘भीष्म पितामह’ कहा जाता था। उनके जाने से सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक पूरा रंगमंचीय युग जैसे खामोश हो गया है।

सतीश आनंद का रंगमंच से रिश्ता आज का नहीं था। 1970 के दशक से उन्होंने पटना रंगमंच को अपना जीवन समर्पित कर दिया। ‘कला संगम’ के निदेशक के रूप में उन्होंने लंबे समय तक नाटकों के निर्देशन, प्रस्तुति और कलाकारों को तैयार करने का काम किया।
उनके निर्देशन में मंचित कई नाटक पटना के रंगमंचीय इतिहास का हिस्सा बन गए।लेकिन सतीश आनंद की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ एक निर्देशक या रंगकर्मी की नहीं थी। वे गुरु थे।
ऐसे गुरु, जिन्होंने मंच पर आने वाले अनगिनत कलाकारों को न सिर्फ अभिनय का हुनर सिखाया, बल्कि उनमें आत्मविश्वास और संघर्ष का जज्बा भी पैदा किया।

उनके मार्गदर्शन में तैयार हुए कई कलाकार आज रंगमंच और फिल्म जगत में अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके लिए सतीश आनंद सिर्फ निर्देशक नहीं, बल्कि वह शख्स थे जिसने उन्हें पहली बार मंच पर खड़े होने का साहस दिया।
उनके साथ लंबे समय तक काम करने वाले और उन्हें अपना गुरु मानने वाले प्रांगण के अभय सिन्हा ने सतीश आनंद के निधन को बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदी रंगमंच के लिए बड़ी क्षति बताया। भावुक अभय सिन्हा ने कहा कि “ शिष्य के सिर से गुरु की छाया हट गई।” उनके शब्द उस खालीपन को बयां करते हैं, जिसे सतीश आनंद अपने पीछे छोड़ गए हैं।
उनके निधन पर अनिल वर्मा , रतन कुमार , सीमा चक्रवर्ती, निलेश मिश्रा, राजीव रंजन श्रीवास्तव, अजीत अनंत, अनिल अमर समेत बड़ी संख्या में रंगकर्मियों ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
सतीश आनंद के जाने का दर्द सिर्फ रंगमंच तक सीमित नहीं रहा। कला, साहित्य, राजनीति और समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े लोगों ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी।

दरअसल, कुछ लोग मंच से विदा होते हैं…लेकिन उनकी आवाज, उनके किरदार और उनके सिखाए कलाकार लंबे समय तक मंच पर जीवित रहते हैं।
सतीश आनंद भी ऐसे ही रंगकर्मी थे। उन्होंने कलाकारों को मंच दिया, रंगमंच को दिशा दी और कई पीढ़ियों को तैयार किया। आज वे खुद मंच से विदा हो गए हैं, लेकिन उनके तैयार किए कलाकारों की हर प्रस्तुति में, रंगमंच की हर रोशनी में और पटना की हर नाट्य स्मृति में उनकी मौजूदगी महसूस होती रहेगी।