Shikhar Samvad

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भूमिगत संरचना की योजना में मृदा आसूचना बनेगी गेमचेंजर

भूमिगत संरचना की योजना में ‘मृदा आसूचना’ बनेगी गेमचेंजर

भारत में तेजी से हो रहे सड़क, रेलवे, डिजिटल नेटवर्क और सौर ऊर्जा अवसंरचना के विस्तार के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की ‘मृदा आसूचना’ तकनीक भूमिगत संरचना की बेहतर योजना और परियोजना जोखिम कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

आईसीएआर–राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एनबीएसएस एवं एलयूपी), नागपुर ने उपग्रह रिमोट सेंसिंग, भू-स्थानिक आंकड़ों और मशीन लर्निंग को मिलाकर ऐसी तकनीक विकसित की है, जो जमीन की खुदाई शुरू होने से पहले ही मृदा की गहराई, वहन क्षमता और अन्य भू-तकनीकी गुणों का पूर्वानुमान लगा सकती है।

यह तकनीक पारंपरिक मृदा सर्वेक्षण की तुलना में समय और लागत में लगभग 75 प्रतिशत तक कमी ला सकती है। तीन सदस्यों की टीम प्रतिदिन करीब 1,000 किलोमीटर मार्ग का प्रसंस्करण कर सकती है। भारत में 50,000 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में इसके सत्यापन के दौरान लगभग 80 प्रतिशत पूर्वानुमान सटीकता हासिल की गई है।

इससे राजमार्ग, रेलवे, भूमिगत केबल, विद्युत पारेषण लाइन और बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों जैसी परियोजनाओं में शुरुआती डिजाइन, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट और बोली-पूर्व लागत अनुमान अधिक विश्वसनीय बनाए जा सकते हैं।

आईसीएआर की यह तकनीक भारत की सीमाओं से आगे भी पहुंच चुकी है। प्रमुख अवसंरचना कंपनियों ने भारत और विदेशों में 2 लाख से अधिक रूट-किलोमीटर के मानचित्रण में इसका उपयोग किया है। इससे परियोजना जोखिम कम करने के साथ भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी बढ़ावा मिल रहा है।

आईसीएआर अब 90 मीटर रिजॉल्यूशन वाले मृदा गहराई और मृदा बनावट के डिजिटल मानचित्र तैयार कर रहा है। ये डिजिटल मृदा मानचित्र भविष्य में डिजिटल कृषि को मजबूत करने और किसानों को भूखंड-विशिष्ट समाधान उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

इस प्रकार, मृदा विज्ञान अब केवल कृषि उत्पादकता तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के तेजी से बढ़ते अवसंरचना और डिजिटल भविष्य की मजबूत नींव तैयार करने में भी अहम भूमिका निभा रहा है।

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