पटना: बिहार ने फाइलेरिया (हाथीपांव) उन्मूलन अभियान में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई है। राज्य के अररिया, मधेपुरा, सुपौल और किशनगंज जिलों ने पहली बार ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (TAS-1) के सभी मानदंड सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। इस उपलब्धि पर संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बिहार की सराहना की है।

इन जिलों में अब सामूहिक दवा वितरण (MDA) की जगह फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के निगरानी चरण की शुरुआत होगी। यह उपलब्धि भारत को वर्ष 2027 तक फाइलेरिया मुक्त बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में बिहार के महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाती है।
स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने कहा कि यह सफलता मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था, वैज्ञानिक रणनीति और जनभागीदारी का परिणाम है। उन्होंने बताया कि अभियान के दौरान डायरेक्टली ऑब्जर्व्ड ट्रीटमेंट (DOT) पद्धति अपनाई गई, जिसमें स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी में लोगों को दवा खिलाई गई। इससे दवा सेवन की प्रभावशीलता और कवरेज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 के एमडीए अभियान के दौरान बिहार ने 11 फरवरी को एक ही दिन में 1.35 करोड़ लोगों को फाइलेरिया रोधी दवा खिलाकर राज्य स्तरीय लक्ष्य से 35 प्रतिशत अधिक उपलब्धि हासिल की थी।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार राज्य के 11 जिलों के 89 इम्प्लीमेंटेशन यूनिट्स में फाइलेरिया संक्रमण दर 1 प्रतिशत से नीचे आ चुकी है। हाल में चार जिलों के 37 इम्प्लीमेंटेशन यूनिट्स में हुए TAS-1 सर्वे में 35 यूनिट्स सभी मानदंडों पर सफल रहे। अररिया और मधेपुरा अब TAS-2 के लिए चयनित हो गए हैं, जबकि सुपौल के सभी इम्प्लीमेंटेशन यूनिट्स निगरानी चरण में प्रवेश कर चुके हैं।
विभाग ने बताया कि जुलाई में राज्य के 25 जिलों के 107 इम्प्लीमेंटेशन यूनिट्स में प्री-ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (Pre-TAS) कराया जाएगा। इसके तहत रात्रिकालीन रक्त नमूनों की जांच के आधार पर संक्रमण की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि बिहार के लिए गर्व का विषय है और देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बनेगी। स्वास्थ्य विभाग फाइलेरिया उन्मूलन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करता रहेगा।