दुमका: कभी दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसा लाठीपहाड़ गांव विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह कटा हुआ था, लेकिन अब यहां बदलाव की नई कहानी लिखी जा रही है। दुमका जिले के इस ऐतिहासिक गांव को आजादी के करीब 84 वर्षों बाद पहली बार पक्की सड़क की सुविधा मिली है, जिससे ग्रामीणों के जीवन में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है…

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अपनी भागीदारी के लिए पहचान रखने वाला लाठीपहाड़ लंबे समय तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा। गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को कठिन पहाड़ी रास्तों का सहारा लेना पड़ता था। सड़क नहीं होने के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी समस्याएं ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई थीं।
ग्रामीणों के अनुसार, बच्चों की पढ़ाई प्राथमिक स्तर के बाद प्रभावित हो जाती थी क्योंकि आगे की शिक्षा के लिए उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलकर पहाड़ी रास्तों से गुजरना पड़ता था। वहीं, किसी के बीमार पड़ने पर मरीजों और गर्भवती महिलाओं को खाट पर उठाकर अस्पताल पहुंचाना पड़ता था।
स्थिति तब बदली जब केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत बस्का से लाठीपहाड़ तक सड़क निर्माण परियोजना को मंजूरी मिली। करीब दो करोड़ रुपये की लागत से पहाड़ी क्षेत्र में 2.41 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कराया गया। परियोजना का शिलान्यास दुमका सांसद नलिन सोरेन ने किया था और निर्धारित समय के भीतर सड़क बनकर तैयार हो गई।
सड़क निर्माण के बाद अब गांव के लोगों को आवागमन में काफी सुविधा मिल रही है। बच्चे नियमित रूप से स्कूल पहुंच पा रहे हैं, जबकि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी आसान हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यह सड़क उनके लिए सिर्फ एक मार्ग नहीं, बल्कि विकास और बेहतर भविष्य की नई उम्मीद बनकर आई है। लाठीपहाड़ में पहुंची यह सुविधा अब गांव को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसरों से जोड़ने का काम करेगी, जिससे वर्षों से विकास की बाट जोह रहे ग्रामीणों के सपनों को नई उड़ान मिलेगी।