Shikhar Samvad

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निदेशक का फरमान मरीज परेशान क्या कागजों पर चल रही है स्वास्थ्य व्यवस्था

रांची: आयुष्मान भारत योजना के तहत झारखंड सरकार अब मोतियाबिंद ऑपरेशन सरकारी अस्पतालों में कराने पर जोर दे रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फैसला स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए है या फिर पहले से बदहाल सरकारी अस्पतालों पर एक और बोझ डालने के लिए? जब पूरे राज्य में केवल 52 नेत्र सर्जन और 289 बेड उपलब्ध हों, तो क्या आयुष्मान मरीजों को प्राथमिकता देने का मतलब आम मरीजों के हिस्से का इलाज छीनना नहीं है?

झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी ने सभी सिविल सर्जनों को निर्देश दिया है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत मोतियाबिंद ऑपरेशन के लिए सरकारी अस्पतालों में बेड आरक्षित किए जाएं।

सवाल यह है कि जब अस्पतालों में पहले से बेड नहीं हैं, तो आखिर आरक्षित क्या किया जाएगा?

झारखंड की वास्तविक तस्वीरकुल नेत्र सर्जन: 52

कुल बेड: 289

अनुमानित जरूरत: 1,50,000

मरीज प्रति वर्षअधिकतम क्षमता: 1,04,000

सर्जरीयानी जरूरत ज्यादा, संसाधन कम।

सरकारी दावा है कि मरीजों को बेहतर इलाज मिलेगा। लेकिन हकीकत यह है कि कई जिलों में डॉक्टर हैं, पर बेड नहीं। और कुछ जिलों में तो डॉक्टर तक नहीं हैं।

सबसे कमजोर जिले

जिला, डॉक्टर, बेड, स्थिति

लोहरदगा 00 न डॉक्टर, न बेड

सिमडेगा 10 ऑपरेशन कैसे होगा?

रामगढ़ 30 डॉक्टर हैं, लेकिन भर्ती कहां?

साहिबगंज 15 सीमित व्यवस्था

पाकुड़ 25 संसाधन बेहद कम

जब लोहरदगा में न डॉक्टर है, न बेड… सिमडेगा में डॉक्टर है, पर बेड नहीं… रामगढ़ में तीन डॉक्टर हैं, लेकिन एक भी समर्पित बेड नहीं…

तो क्या सरकार सिर्फ फाइलों में ऑपरेशन बढ़ाने की तैयारी कर रही है?

बड़े सवाल

क्या आयुष्मान के लिए अलग से बेड दिए गए?

क्या नए डॉक्टरों की नियुक्ति हुई?

क्या ऑपरेशन थिएटर बढ़ाए गए?

क्या नर्सिंग स्टाफ उपलब्ध कराया गया?

या सिर्फ आदेश जारी कर जिम्मेदारी अस्पतालों पर डाल दी गई?

यदि आयुष्मान मरीजों के लिए बेड आरक्षित होंगे, तो सामान्य मरीज कहां जाएंगे? क्या गरीब मरीजों के नाम पर दूसरे गरीब मरीजों का हक छीना जाएगा? क्या सरकार निजी अस्पतालों का खर्च बचाने के लिए सरकारी अस्पतालों पर दबाव बढ़ा रही है?

आम मरीजों पर संभावित असर

ऑपरेशन के लिए लंबा इंतजार

भर्ती के लिए बेड नहीं

ओपीडी में बढ़ती भीड़

अन्य नेत्र रोगियों का इलाज प्रभावित

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि एक नेत्र सर्जन केवल मोतियाबिंद ऑपरेशन नहीं करता। उसे ग्लूकोमा, रेटिना, संक्रमण और आपातकालीन मामलों का भी इलाज करना होता है।

तो क्या सरकार ने यह आकलन किया कि अतिरिक्त बोझ से बाकी मरीजों पर क्या असर पड़ेगा?

बिना अतिरिक्त डॉक्टर, बेड और उपकरण दिए नई जिम्मेदारी थोपना व्यवस्था सुधार नहीं, बल्कि मौजूदा संसाधनों पर असंभव दबाव डालना है।”

आयुष्मान योजना गरीबों के लिए बनी है। लेकिन यदि उसे लागू करने के लिए पहले से बदहाल सरकारी अस्पतालों के सीमित संसाधनों पर ही अतिरिक्त बोझ डाल दिया जाए, तो इसका खामियाजा आखिर कौन भुगतेगा?

क्या सरकार स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत कर रही है… या फिर सिर्फ आंकड़े चमकाने के लिए मरीजों को लंबी कतारों में खड़ा करने की तैयारी है?

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