Shikhar Samvad

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पंचायतों में सही पोषण के जरिये कुपोषण हो रहा खत्म महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर जनप्रतिनिधियों का जोर…

पटना: राज्य की पंचायतों में जनप्रतिनिधियों द्वारा महिलाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कुपोषण, एनीमिया, कैल्शियम जैसी गंभीर समस्याओं को जड़ से खत्म करने के लिए गांव स्तर पर पोषण वाटिका लगाई जा रही हैं और युद्ध स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इन प्रयासों के माध्यम से हजारों बच्चों के भविष्य को अंधकार से उजाले की ओर ले जाने की सकारात्मक कोशिश की जा रही है।

केस 1: हर घर के पास पोषण वाटिका नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड के तेलमर पंचायत के मुखिया विद्यानंद बिंद (42 वर्ष) सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहते हैं। इस नाते वे जनता के मुख्य मुद्दों को गंभीरता से समझते हैं और उनके त्वरित समाधान ढूंढते हैं। उन्होंने अपने पंचायत में कुपोषण की समस्या को पहचाना और उन क्षेत्रों को चिन्हित किया जहां वंचितों तक पोषण का कोई स्रोत नहीं पहुंच रहा था। इस समस्या को जड़ से मिटाने के लिए उन्होंने गांववालों को घर के पास ही पोषण वाटिका लगाने की सलाह दी।

मुखिया विद्यानंद बताते हैं कि पंचायती राज विभाग की तरफ से आयोजित विभिन्न ट्रेनिंग के जरिए उन्होंने पोषण के महत्व के बारे में जानकारी प्राप्त की। ग्राम सभाओं में स्वस्थ शरीर के लिए पोषण की आवश्यकता पर चर्चा की। आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं के माध्यम से गांव की महिलाओं को पोषण वाटिका लगाने के लिए प्रेरित किया। अपने खर्चे पर बीज मंगवाकर विशेष रूप से दलित बस्तियों में पोषण वाटिका लगाई, जिससे वहां की महिलाओं और बच्चों में एनीमिया की कमी दूर हो सके और लाल-हरी पत्तेदार सब्जियां हमेशा उपलब्ध रहें।

यह देखकर गांव के अन्य लोग भी प्रेरित हो रहे हैं और घर के पास छोटी जगह में पौष्टिक सब्जियां उगा रहे हैं। मुखिया ने अपने गांव में “सही पोषण, देश रोशन” का नारा भी दिया है।

केस 2: डिब्बे के दूध से मुक्ति की राह पर मोहद्दीनपुर पंचायत नवादा जिले के ही वारिसलीगंज प्रखंड के मोहद्दीनपुर पंचायत में एक नई शुरुआत हुई,‌जब प्रभु प्रसाद पहली बार मुखिया बने। प्रशिक्षण के दौरान मिली जानकारी से प्रेरित होकर उन्होंने समाज में बदलाव लाने का फैसला किया। उन्होंने अपने पंचायत को डिब्बे के दूध से मुक्त करने का लक्ष्य रखा। इसके लिए वे स्वयं महिलाओं को स्तनपान की अहमियत समझाते हैं।

यह मुहिम आसान नहीं थी। प्रभु प्रसाद ने खुद मैदान में उतरकर स्वास्थ्य कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी शुरू की। पोषण माह के अवसर पर आंगनबाड़ी केंद्र पर महिलाओं को पोषण के महत्व, चार प्रमुख स्वास्थ्य जांचों, आयरन-कैल्शियम गोलियों के सेवन, पूरक पोषाहार और विशेष रूप से बच्चों को पहले छह महीने तक केवल मां का दूध देने की अहमियत बताई।

लोगों के सुझाव पर यह तय हुआ कि पूरे पंचायत को ‘डिब्बे का दूध मुक्त पंचायत’ घोषित किया जाए। प्रभु प्रसाद ने घोषणा की कि जल्द ही पूरे पंचायत में जागरूकता अभियान चलाकर इसे औपचारिक रूप से घोषित किया जाएगा। दोनों जनप्रतिनिधियों की यह यात्रा समर्पण की मिसाल है। उनके दृढ़ संकल्प ने साबित कर दिया कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए समर्पण जरूरी है।

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