रांची: खान एवं खनिज विकास और विनियमन यानी MMDR विधेयक के खिलाफ झारखंड कांग्रेस ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया है। कांग्रेस ने विधेयक के विरोध में चरणबद्ध आंदोलन का कार्यक्रम तय किया है। पार्टी का कहना है कि इस कानून से झारखंड के खनिज संसाधनों और राज्य के आर्थिक हितों पर असर पड़ेगा।

27 अगस्त से आंदोलन की शुरुआत
कांग्रेस के तय कार्यक्रम के मुताबिक 27 अगस्त को जिलास्तर पर धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। इसके बाद 7 सितंबर को राज्यस्तरीय कार्यक्रम के तहत लोकभवन के समक्ष प्रदर्शन होगा।
वहीं, 9 से 16 सितंबर तक सभी प्रखंडों में धरना-प्रदर्शन कर लोगों को MMDR विधेयक से झारखंड को होने वाले संभावित नुकसान के बारे में जागरूक करने का अभियान चलाया जाएगा।
सुबोध कांत सहाय ने केंद्र पर लगाया आर्थिक कुठाराघात का आरोप
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय ने केंद्र सरकार पर झारखंड के आर्थिक हितों के साथ कुठाराघात करने का आरोप लगाया। कांग्रेस कार्यालय में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार मनमाने तरीके से इस विधेयक को राज्यों पर थोपना चाहती है, जिसे झारखंड की जनता स्वीकार नहीं करेगी।
उन्होंने कहा कि MMDR विधेयक के जरिए आदिवासी-मूलवासी अधिकारों पर भी हमला हो रहा है।
‘14 हजार करोड़ की राशि पर केंद्र की नजर क्यों?’
सुबोध कांत सहाय ने कहा कि झारखंड को सेस और रॉयल्टी से करीब 14 हजार करोड़ रुपये की राशि प्राप्त होती है। उनके मुताबिक, राज्य के 2026-27 के बजट में इस राशि को ध्यान में रखते हुए कई योजनाएं शामिल की गई हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह राशि राज्य को नहीं मिलेगी तो विकास योजनाओं को पूरा करना मुश्किल होगा।
‘खनिज हमारा, जमीन हमारी, फैसला दिल्ली का नहीं चलेगा’
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि झारखंड में खनिज और जमीन राज्य के हैं, ऐसे में फैसले का अधिकार भी राज्य के हितों को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “खनिज हमारा, जमीन हमारा, लेकिन फैसला दिल्ली का—यह नहीं चलेगा।”
सुबोध कांत सहाय ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि नौ जजों की संविधान पीठ ने खनिज और उससे जुड़े अधिकारों को लेकर राज्यों के अधिकार को स्पष्ट किया था।
कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि MMDR विधेयक के खिलाफ आंदोलन को जिलों से लेकर प्रखंड और राज्य स्तर तक ले जाया जाएगा। अब देखना होगा कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच खनिज अधिकारों को लेकर यह राजनीतिक टकराव किस दिशा में जाता है।