Shikhar Samvad

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एक सौ नौ साल बाद भी खड़ी है गांधी की वो कुटिया जिसे अंग्रेजों ने जलाने की कोशिश की जानें भितिहरवा की कहानी…

भितिहरवा गांधी आश्रम: पश्चिम चंपारण के भितिहरवा गांव में आज भी एक ऐसी कुटिया मौजूद है, जो 1917 के चंपारण सत्याग्रह की यादों को अपने भीतर समेटे हुए है। करीब 109 साल बाद भी यह कुटिया गांधी के सत्य, अहिंसा, शिक्षा और स्वच्छता के संदेश की गवाह बनी हुई है। कभी अंग्रेजी हुकूमत ने इसे आग के हवाले करने की कोशिश की थी, लेकिन ग्रामीणों ने इसे दोबारा खड़ा कर दिया।

राजकुमार शुक्ल की जिद से चंपारण पहुंचे गांधी

1917 में चंपारण के किसान अंग्रेजों द्वारा कराई जा रही जबरन नील की खेती से परेशान थे। किसानों की पीड़ा को देश के सामने लाने के लिए राजकुमार शुक्ल लगातार महात्मा गांधी से चंपारण आने का आग्रह करते रहे। आखिरकार गांधी चंपारण पहुंचे। 27 अप्रैल 1917 को वे नरकटियागंज आए और अमोलवा में रात बिताई।

इसके बाद गांधी ने गांव-गांव जाकर किसानों की समस्याएं सुनीं। उन्हें महसूस हुआ कि किसानों की परेशानियां सिर्फ नील की खेती तक सीमित नहीं थीं। अशिक्षा, गंदगी और सामाजिक पिछड़ापन भी ग्रामीण जीवन की बड़ी चुनौतियां थीं।

20 नवंबर 1917 को शुरू हुई पाठशाला

भितिहरवा में 20 नवंबर 1917 को स्कूल की शुरुआत हुई। कस्तूरबा गांधी समेत कई सहयोगी इस अभियान से जुड़े। बच्चों को शिक्षा देने के साथ ग्रामीणों को स्वच्छता और सामाजिक सुधार के लिए भी जागरूक किया गया।

गांधी का उद्देश्य सिर्फ अंग्रेजी शासन का विरोध करना नहीं था। वे मानते थे कि गांवों को शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता के जरिए मजबूत किए बिना व्यापक बदलाव संभव नहीं है। यही वजह थी कि चंपारण में सत्याग्रह के साथ सामाजिक सुधार का अभियान भी आगे बढ़ा।

अंग्रेजों ने कुटिया में लगाई आग

भितिहरवा में गांधी की गतिविधियां बढ़ने लगीं तो अंग्रेज अधिकारियों की नजर भी इस पर गई। इसी दौरान गांधी के ठहरने वाली कुटिया में आग लगा दी गई। उस समय गांधी वहां मौजूद नहीं थे।

कुटिया को जलाने के बावजूद ग्रामीणों का उत्साह नहीं टूटा। उन्होंने मिलकर इसे दोबारा बनाया। गांधी ने भी इसके निर्माण में श्रमदान किया। आज यही कुटिया भितिहरवा गांधी आश्रम की सबसे महत्वपूर्ण स्मृतियों में शामिल है।

आज भी मौजूद हैं 1917 की कई निशानियां

भितिहरवा आश्रम में आज भी उस दौर से जुड़ी कई वस्तुएं मौजूद हैं। कस्तूरबा गांधी द्वारा इस्तेमाल किया गया जांता, गांधी की मेज, पाठशाला की घंटी और 1917 में बनाया गया कुआं उस समय की गतिविधियों की याद दिलाते हैं।

इन निशानियों से यह समझने में मदद मिलती है कि गांधी का चंपारण अभियान केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं था। उन्होंने ग्रामीणों के बीच रहकर शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक सुधार को भी आंदोलन का हिस्सा बनाया था।

109 साल बाद भी जिंदा है गांधी का संदेश

चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना। वहीं भितिहरवा ने इस आंदोलन को सामाजिक बदलाव का भी स्वरूप दिया। यहां अंग्रेजी सत्ता के विरोध के साथ अशिक्षा, गंदगी और सामाजिक पिछड़ेपन के खिलाफ भी अभियान चलाया गया।

आज भितिहरवा गांधी आश्रम गांधी सर्किट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां आने वाले लोग उस कुटिया और आश्रम परिसर में मौजूद निशानियों के जरिए 1917 के उस दौर को महसूस करते हैं। 109 साल बाद भी यह कुटिया चंपारण में गांधी के सत्य, अहिंसा, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के संदेश की कहानी सुनाती है।

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